क्या आँखों से देखा और कानो से सुना हमेशा सत्य होता है ? What is seen with eyes and listening to ears is always true ?

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क्या आँखों से देखा और कानो से सुना हमेशा सत्य होता है ? What is seen with eyes and listening to ears is always true ?

अक्सर हमने लोगों  को ऐसा कहते हुए देखा है कि जो अपनी आँखों से देखो और जो अपने कानो से सुनो उसे ही सच मानो | 

अब ये बातें कही तो जाती है लेकिन इन बातों के कहने का तात्पर्य क्या होता है और क्या इसका जो शाब्दिक अर्थ निकलता है हमें सिर्फ उसी पर ध्यान देना चाहिए ?

आज हम इन्ही बातों को समझने की कोशिश करते है |

दरअसल कुछ हद तक तो इस बात को सही कहा जा सकता है कि जो खुद देखो और खुद सुनो उसे सच मानो परन्तु हमारे जीवन में बहुत से ऐसे क्षण आते है, बहुत सी ऐसी परिस्थीतियां आती है,  बहुत सी ऐसी बातें होती हैं जो हमे ये सोचने पर विवश कर देते हैं कि जो दिख रहा है या जो हमने अपने कानों से सुनाई दे रहा है सिर्फ वो ही सच नहीं है बल्कि सच उससे भिन्न और अलग है |

आपने देखा होगा की ज्यादातर लोगो के जीवन में सुख और समृद्धि होती है और अपने कार्य क्षेत्र में भी तुलनात्मक रूप से सफल होते है | इनका सामजिक और पारिवारिक जीवन बेहतर होता है लेकिन फिर भी ये लोग अपने जीवन में उतने खुश नही होते बल्कि कई तो तनाव ग्रस्त भी होते हैं जो समय के साथ अवसाद में बदल जाता है, जिसे हम आजकल डिप्रेसन कहते हैं |

अब अगर आप इसकी तह में जाकर देखेगें तो पायेंगे कि इनकी समस्या की जड़ में बहुत सी वजहों में से एक वजह ये भी है कि इन्होने जो देखा और जो सूना, उसे ही सच मान लिया, मसलन इनके किसी साथी ने ये कह दिया की भाई मै तो कम मेहनत में ही इतना कमा लेता हूँ और देखो अब छुट्टी मनाने जा रहा हूँ | अब मित्र ने तो कह दिया और इन्होने अपने कानो से सुन लिया और साथ ही इन्होने ये देख लिया और सोच भी लिया कि एक मै हूँ जो दिन रात काम करता रहता हूँ और फुरसत के एक पल भी नसीब नहीं है वही इसे देखो काम भी कम करता है और मौज भी ज्यादा करता है | अब इनके दिमाग में ये बात दिन रात घुमने लगती है और फिर यही से शुरुआत होती है अवसाद (डिप्रेसन) की | धीरे –धीरे यही अवसाद गंभीर रूप ले लेती है |

अब अगर आप ध्यान पूर्वक देखें तो आप ये पायेंगे की हम सभी दूसरों के जीवन में हो रही बातों को या फिर दूसरों के जीवन में घट रही घटनाओं को सिर्फ देख सुन कर ही सच मान लेते हैं और अपने मन को बीमार कर लेते है जबकि अगर हम इसके स्थान पर दूसरों के जीवन में घट रही घटनाओं का मुल्यांकन करते तो ये समझ पाते कि कमोबेश (कम या ज्यादा) जैसा आपका जीवन है, जितना सुख दुःख आपके जीवन में है उतना ही दूसरों के जीवन में भी है और लोगों में दूसरों के सामने अपनी समस्याओं को छिपाने के लिए या फिर अपनी उपलब्धियों को, अपनी सफलताओं को बढ़ा –चढ़ा के बताने की आदत होती है जबकि सच ये होता है कि उन्होंने भी अपने जीवन में कुछ पाने के लिए तरह – तरह के परिस्थीतीयों से गुज़ारना पड़ा हैं लेकिन वे इन बातों का जिक्र नहीं करते और लोगों के सामने सिर्फ उन्ही बातों का जिक्र करते हैं जिससे लोगों की नज़र में उनका कद बड़ा हो सके |

तो कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि यदि आप कुछ देखें या फिर कुछ सुने तो उस पर आँख बंद कर विश्वास ना करें बल्कि उसे अपनी स्थिति और परिस्थिति की कसौटी पर जरुर कसे और तब आप जो पायेंगे वही सच और वास्तविक होगा | इससे आप उस अवसाद से भी बचंगे जो दूसरों की ओर आँख कान बंद कर देखने और सुनने की वजह से होता है |

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